गावां वन प्रक्षेत्र के असुरहड्डी व सिजुवाई जंगल में हो रहा है कीमती बैरल पत्थर का अवैध खनन, विभाग मौन

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रिपोर्ट- संतोष तिवारी

गिरिडीहः जिले के गावां वन प्रक्षेत्र स्थित असुरहड्डी व सिजुवाई जंगल में लंबे समय से अवैध बैरल पत्थर की खुदाई धड़ल्ले से हो रही है। यहां प्रतिदिन दिन के उजाले में मजदूरों से और रात के अंधेरे में जेसीबी मशीन के माध्यम से बड़े पैमाने पर अवैध बैरल पत्थर का उत्खनन किया जा रहा है, जिससे पहाड़ व जंगल के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है, वहीं सरकार को भी करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकशान हो रहा है।

अवैध खनन से पर्यावरण को पहुंच रहा है भारी नुकशानः

इन दोनों ही पहाड़ियों पर हो रहे लगातार अवैध उत्खनन से पहाड़ी पर बड़े-बड़े गड्ढे और समतल मैदान नजर आने लगे हैं, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है। ये पूरा का पूरा क्षेत्र वन विभाग के अंतर्गत आता है, लेकिन इस अवैध उत्खनन पर वन विभाग पूरी तरह मौन धारण किए हुए है, जिससे स्पष्ट होता है कि वन विभाग के लोग भी इस अवैध उत्खनन में शामिल हैं।

बैरल पत्थर की सफाई करते मजदूर.

अवैध खनन क्षेत्र के पास ही स्थित है पुलिस पिकेटः

अवैध तरीके से बैरल पत्थर की खुदाई के दौरान हरे-भरे पेड़ भी काटे जा रहे हैं। लेकिन वन विभाग ना तो पेड़ बचाने के लिए आगे आ रहा है और ना ही अवैध उत्खनन रोकने के लिए कोई कार्रवाई ही कर रहा है। पत्थर उत्खनन का क्षेत्र बरमसिया पुलिस पिकेट से मात्र 3 किमी की दूरी पर स्थित है।

जान जोखिम में डाल कर ऐसे सैंकड़ों गड्डे से निकला जाता है बैरल स्टोन.

पूर्व में वन विभाग की टीम कर चुकी है कार्रवाईः

लगभग छह माह पूर्व गावां वन विभाग द्वारा उक्त स्थान पर डोजरिंग कर खदानों को ध्वस्त कर दिया गया था और उक्त स्थल से खनन में उपयोग किए जाने वाले कई उपकरण जिसमें टेंट, सोलर प्लेट और खुदाई का औजार जब्त किया गया था। कार्रवाई के कुछ दिनों तक अवैध उत्खनन बंद रहा, लेकिन हाल के दिनों में एक बार फिर से पत्थर तस्करों ने बड़े पैमाने पर बैरल पत्थर का खुदाई करवाना शुरु कर दिया है।

गुणवत्ता के आधार पर 5 से 50 हजार रुपये प्रति किलोग्राम बिकती है बैरल पत्थरः

बैरल पत्थर को तुरमली पत्थर के नाम से भी जाना जाता है। जिसकी कीमत बाजार में गुणवत्ता के आधार पर लगभग पांच हजार से पच्चास हजार रुपए प्रति किलो तक है। पत्थर तस्कर इसकी बिक्री कोलकाता, नेपाल, बैंगलोर सहित कई अन्य राज्यों में करते हैं। इसके अलावा दूसरे राज्यों के व्यापारी भी यहां बैरल पत्थर खरीदने के लिए पहुंचते हैं। पुख्ता जानकारी ये भी है कि उक्त कार्य में बाहरी माफिया के साथ-साथ कुछ स्थानीय लोग भी संलिप्त हैं, जो आसपास के गांवों में रहने वाले भोले-भाले ग्रामीणों को रुपए का लालच देकर उत्खनन करवाते हैं। यहां काम करने वाले ग्रामीण महज दैनिक मजदूरी के लालच में आकर मौत के गहरे सुरंग में घुसकर कीमती पत्थरों को निकालने का कार्य करते हैं। जिसमें कई बार यहां होने वाली दुर्घटनाओं में इनकी जान तक चली जाती है, लेकिन पत्थर तस्कर इनकी गरीबी का फायदा उठाते हुए चंद रुपये देकर इन घटनाओं को दबा देते हैं।  

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