भूख और बिमारी से पीड़ित 63 वर्षीय दुगीया उरांव की मौत, जायदाद के लिए परिजनों ने घर से निकाला, सरकार ने वंचित रखा राशन और वृद्धा पेंशन से…

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रिपोर्ट- संजय वर्मा…

रांचीः मांडर प्रखंड सुरसा पंचायत अंतर्गत मसमानों गांव में बिस्तर पर पड़ी लगभग बेजान सी हो चुकी 63 वर्षीय महिला दुगीया उरांव, उसकी बहन 58 वर्षीय सलगी उरांव और दुगीया की 22 वर्षीय बेटी नंदी उरांव से 18 मार्च को मैने मुलाकात कर पूरे मामले की जानकारी लेने का काम किया था। लेकिन आज(दिनांक-19 मार्च 2021) खबर मिली की दुगीया की मौत दोपहर को हो गई है।

इस पूरे मामले पर बेटी नंदी बताती है कि, मसमानों गांव के पास ही स्थित नगड़ा गांव में हम लोगों का अपना घर है, जहां मेरे बड़े मामा लेले उरांव हमलोगों का जमीन हड़पने के लिए मेरी मां और मौसी के साथ मारपीट किया करते थें। लगभग 10 साल पहले ही मेरी मां जान बचाने के लिए मुझे और मौसी को लेकर घर से निकल गई थी। तभी से हमलोग 7 साल बस्की गांव में रहें, फिर मसमानों गांव के एक व्यक्ति जो वर्तमान में रांची में रह रहे हैं, उन्होंने अपना घर हमलोगों को रहने के लिए दिया। यहां हमलोग पिछले तीन साल से रह रहे हैं।

स्थानीय किसानों के खेत में मजदूरी कर गुजारा करते थेः नंदी उरांव

नंदी बताती है कि यहां हम लोगों के पास ना ही राशन कार्ड है और ना ही मां और मौसी को वृद्धा पेंशन ही मिलता है। हमलोग गांव वालों के ही खेत में मजदूरी करते है, उसी से जो मेहनताना मिलता था गुजारा कर लेते थें, लेकिन पिछले दिसंबर माह से मां और मौसी की तबियत बिल्कूल खराब हो गई है। दोनों रात-रात भर रोते रहते हैं। हम दिन-रात दोनों का सेवा करते हैं, लेकिन घर में अब खाने के लिए कुछ नही है। गांव वाले दया करके जो देते हैं उसी से गुजारा करते हैं।

कई बार इनका राशन कार्ड बनाने के लिए मुखिया से कहें, लेकिन मुखिया दूसरे गांव का बता कर ध्यान नही दीः दिनेश शाही, सेवानिवृत सेना के जवान सह स्थानीय निवासी

मसमानों गांव के बगल में ही स्थित है बस्की गांव, जहां सेवा निवृत सेना के जवान दिनेश शाही रहते हैं। पीड़ित परिवार के बारे में दिनेशा शाही ने ही “ताजा खबर झारखंड के कार्यालय में फोन कर पुरे मामले की जानकारी देने का काम किया था। दिनेश शाही बताते है कि, ये लोग काफी गरीब है, जिसे देखते हुए मैं कभी-कभी इन्हें कुछ चावल उपलब्ध करवा देता हूं। इन लोगों का राशन कार्ड नहीं है और ना ही वृद्धा पेंशन मिलता है। मुखिया, फूलमणि मिंज को इन लोगों के बारे में जानकारी दिया गया था, लेकिन मुखिया ने इस गरीब परिवार पर कोई ध्यान नहीं दिया, जिसके बाद मैनें आपको फोन किया।

इन लोगों का ना ही आधार कार्ड है ना ही पहचान पत्र कैसे बनेगा राशन कार्डः फूलमणि मिंज, मुखिया

इस पूरे मामले पर पंचायत की मुखिया फूलमणि मिंज से बात की गई। मुखिया ने कहा कि, ये लोग इस पंचायत के नहीं हैं। मैंने कहा कि ये लोग पिछले 10 वर्षों से आपके पंचायत में ही रह रहे हैं और प्रखंड मांडर ही पड़ता है। फिर मुखिया ने कहा कि इनका राशन कार्ड कैसे बनेगा इनलोगों के पास ना ही आधार कार्ड है और ना ही वोटर आईडी कार्ड। लेकिन पीड़ित परिवार के दोनों बुजुर्गों का वोटर आईडी कार्ड बना हुआ है, ये जानकारी मुखिया को नहीं थी, क्योंकि मुखिया ने लोगों के कहने के बावजुद कभी इस परिवार पर ध्यान ही नही दिया। लेकिन मेरे द्वार फोटो पहचना पत्र होने की बात कहे जाने के बाद मुखिया ने ये भरोषा दिलाया कि मैं राशन कार्ड के लिए ऑनलाईन अप्लाई करवा देता हूं और जब तक राशन कार्ड नहीं बन जाता है, हर माह 10 किलो चावल इन लोगों को उपलब्ध करवा दिया जाएगा। 19 मार्च को मुखिया ने 10 किलो चावल भी उपलब्ध करवाया, लेकिन तब तक दुगीया उरांव दम तोड चुकी थी।

मृत्यू के बाद चचेरा भाई ले गया मृतिका का शव नगड़ा गांवः

18 मार्च को ताजा खबर झारखंड की टीम ने नगड़ा गांव जाकर दुगीया उरांव के चचेरे भाई से कहा था कि, आपलोगों के कारन ही आज ये लोग भूखमरी के कागार पर है, आप लोगों ने इनका जमीन हड़पने के लिए घर से बेघर कर दिया है। इस पर दुगीया उरांव के छोटे चचेरे भाई चुलुवा उरांव ने कहा कि, उस दौरान मैं काम के लिए बाहर गया हुआ था। मेरे बड़े भाई लेले उरांव ने घर से बेघर किया है। मैं इन लोगों को ले जाने के लिए तैयार हूं। लेकिन पीड़ित परिवार ने चुलुवा उरांव के साथ अपने घर जाने से ईन्कार कर दिया, क्योंकि इन्हें डर था कि लेले उरांव के बेटे फिर मारपीट करेंगे। इस पर चुलुवा उरांव ने गांव वालों के समक्ष भरोषा दिलाया था कि, आज से इनलोगों का देखभाल मैं करुंगा।

अपनो की लालच और सरकार की लचर व्यवस्था से हार गई दुगीया उरांवः

19 मार्च की दोपहर दुगीया उरांव ने दम तोड़ दिया। हलांकि जिस वक्त मुझे ये खबर मिली उससे आधे घंटे पूर्व मैंने मुखिया के माध्यम से मांडर प्रखंड कार्यलय में बात की, जहां उस दौरान प्रखंड विकास पदाधिकारी मौजुद नही थें। लेकिन कार्यालय में मौजुद कलर्क को जब मैने पूरे वस्तु स्थिति से अवगत करवाया तो उन्होंने प्रखंड विकास पदाधिकारी से बात कर उचित कदम उठाने की बात कही थी, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। अब भी वक्त है भुखमरी के कागार पर खड़ी 22 वर्षीय बेटी नंदी उरांव और 58 वर्षीय उसकी मौसी सलगी उरांव को विकास योजनाओं का लाभ देकर उन्हें बचाने का।

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