हापतबेड़ा गांव को स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने बना दिया है आफतबेड़ा गांव. ग्रामीण कोस रहे हैं हेमंत सरकार को….
रिपोर्ट- संजय वर्मा…
रांची( सिल्ली विधानसभा) – देश के संविधान ने हर जाति, समुदाय के लोगों को गरीमा के साथ जीवन जीने का अधिकार दिया है। देश के साथ-साथ राज्य सरकार को ये सुनिश्चित करना है कि देश का हर नागरीक, चाहे वो किसी भी जाति या समुदाय से हों, वो गरीमा के साथ अपना जीवन जी सके, लेकिन वर्तमान में केन्द्र के साथ-साथ राज्य सरकार अपने इस कर्तव्य के निर्वाह्न में विफल होते दिख रही है।
हापतबेड़ा गांव में 150 से भी अधीक घर, रहने वाले हजारों लोग मुलभूत सुविधा से वंचितः
राजधानी रांची मुख्यालय से लगभग पैंतालिस किलोमीटर की दूरी पर सिल्ली विधान सभा अंतर्गत स्थित है हापतबेड़ा गांव, जिसे यहां के स्थानीय निवासी अब आफतबेड़ा कहने लगे हैं। ग्रामीण बताते हैं कि गुड़ीडिह पंचायत के हापतबेड़ा गांव में एक सौ पच्चास से भी अधीक घर है, जिसमें लगभग एक हजार लोग निवास करते हैं। यहां मुख्य तौर पर उरांव, मुंडा और बेदिया जनजति के लोग रहते हैं। हापतबेड़ा के ठीक बगल में स्थित है हेसलाबेड़ा गांव। इन दोनों गांव के लोगों ने दो हजार चौबीस में संपन्न हुवे चुनाव के दौरान सरकार से मुलभुत सुविधा उपलब्ध कराने की मांग को लेकर वोट बहिष्कार का एलान किया था, जिसके बाद स्थानीय प्रशासन तेज हुई और गांव वालों को लिखित आश्वासन दिया कि आपलोग मतदान का बहिष्कार ना करें, चुनाव के बाद आप लोगों की मागों पर यथासंभव गौर किया जाएगा। लेकिन चुनाव के दो साल बाद भी यहां कि स्थिति जस की तस बनी हुई है। स्थानीय अंचल अधिकारी, प्रखंड विकास पदाधिकारी और थानेदार ने जो आश्वासन दिया था वो अब तक ठंडे बस्ते में पड़ा है। ये कहा जा सकता है कि, मतलब निकल गया, अब हम तुम्हे पहचानते नहीं।

कई बार स्थानीय प्रशासन और विधायक को सौंपा गया मांग पत्रः
स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां के लोग सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा और रोजगार से पुरी तरह वंचित हैं….गांव के वार्ड सदस्य, महेन्द्र महतो बताते हैं कि गांव के उत्तर और दक्षिण दिशा में रेलवे लाईन है। जोन्हा से हापतबेड़ा गांव पहुंचने के लिए लगभग तीन किलोमीटर में रेलवे द्वारा एनओसी नहीं दिये जाने के कारन सड़क का निर्माण नहीं हो पा रहा है। गांव वालों ने कई बार स्थानीय प्रशासन और विधायक को मांग पत्र सौंपा, लेकिन कई वर्षों बाद भी एनओसी नहीं मिला है। बरसात के दिनों में लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पडता है। अगर किसी गर्भवती महिला को इस कच्ची सड़क से वाहन में बैठा कर अस्पताल ले जाया जाए, तो गर्भवती महिला वाहन में ही बच्चे को जन्म दे देगी।
सभी जल मीनार चढ़ा भ्रष्टाचार की भेंट, दाड़ी से प्यास बुझा रहे हैं हजारों लोगः
यहां के ग्रामीणों को सालों भर पीने के पानी की समस्या से दो चार होना पड़ता है। गांव में एक कुंवां है, जो लगभग एक हजार स्थानीय लोगों की प्यास बुझाती है। सरकार ने गांव में कुछ वर्षों पूर्व हर घर जल योजना के तहत तीन जल मीनार का निर्माण करवाया था जो एक साल बाद ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। वर्तमान में स्थानीय लोग दोनों रेलवे लाईन, अप और डाउन लाईन के बीच में स्थित एक दाड़ी से अपनी प्यास बुझा रहें हैं। इसी दाड़ी से पालतु पशु भी पानी पीते हैं, जिससे महामारी फैलने का खतरा यहां के ग्रामीणों पर मंडरा रहा है। बरसात के दिनों में दाड़ी का पानी भी गंदा हो जाता है। पीने की पानी के लिए इन्हों तीन किलोमीटर दूर स्थित जंगल-पहाड़ों का रास्ता तय कर पानी लाना पड़ता है।


बिजली के तार और ट्रांस्फारमर सिर्फ गांव की शोभा बढ़ा रही हैः
गांव में लगे बिजली का ट्रांस्फारमर और तार सिर्फ गांव की शोभा बढ़ा रही है। कई-कई सप्ताह गांव में लाईन नहीं रहती है। जंगल और पहाड़ों से घीरे रहने के कारण यहां बज्रपात होते रहती है, ऐसे में बिजली का टुट कर गिरना और ट्रांस्फारमर जलना यहां आम बात है। बिजली विभाग में शिकायत करने पर भी कम से कम सप्ताह भर बाद बिजली के तार या ट्रांस्फारमर दुरुस्त किया जाता है। गांव में आधा- अधुरा आंगनबाड़ी केन्द्र बना है, जिसके कारन नौनिहालों को खपड़े के एक छोटे से घर में पढ़ाया जाता है। यहां एक प्राथमिक विद्यालय है, लेकिन ग्रामीण बताते हैं कि तीन पारा शिक्षकों के भरोषे ये स्कूल चल रहा है। आठवीं के बाद बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए दस किलोमीटर दूर का सफर तय करना पड़ता है, जिसके कारन कुछ बच्चे शिक्षा से वंचित रह जा रहे हैं। जो बच्चे स्कूल जा भी रहे हैं, तो ये बच्चे लंबी दूरी तय करने से बचने के लिए रेलवे ट्रैक से हो कर आवागमन करते हैं, जिसके कारन दुर्घटना का भय हमेशा बना रहता है। ग्रामीण इस रेलवे ट्रेक पर पोल संख्या 32 के पास अंडर पास पुल बनाने की मांग कर रहे हैं, ताकि रेलवे ट्रैक पर दुर्घटना से बचा जा सके। इस गांव में कई पालतु पशुओं की मौत ट्रेन की चपेट में आने से हो चुकी है, जिससे ग्रामीणों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।
हेसलाबेड़ा स्टेशन पर ट्रेनों का ठहराव नहीं होने से रोजगार और उच्च शिक्षा से वंचित हैं यहां के ग्रामीणः
ग्रामीण ये भी बताते हैं कि, पूर्व में हेसलाबेड़ा स्टेशन पर कुछ ट्रेनों का ठहराव होता था, जिससे मजदूरी करने वाले ग्रामीण और शिक्षा के लिए रांची जाने वाले छात्रों को काफी सुविधा होती थी, लेकिन वर्तमान में इस स्टेशन पर ट्रेनों का ठहराव बंद कर दिया गया, जिसके कारन मजदुरी कर अपना भरणपोषण करने वाले ग्रामीणों और छात्रों को काफी परेशानी हो रही है।
समस्या से निजात के लिए ग्रामीणों ने भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष को गांव में किया आमंत्रितः

स्थानीय प्रशासन, मुखिया और क्षेत्र के विधायक को ग्रामीणों की समस्या से कोई लेना देना नहीं है, जिससे खफा हो कर ग्रामीणों ने भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष, आरती कुजूर को गांव में आमंत्रित किया। ग्रामीणों की समस्या को देखते हुए आरती कुजूर स्थानीय भाजपा नेताओं के साथ पंद्रह जून को गांव में पहुंची और ग्रामीणों की समस्याओं से रुबरु हुईं। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों की समस्या गंभीर है। ग्रामीण अब इस गांव को हापतबेड़ा नहीं बल्कि आफतबेड़ा नाम से पुकारने लगे हैं और इस आफत का कारन स्थानीय प्रशासन, और वर्तमान जनप्रतिनिधि है, जो इनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। इस मामले को पार्टी ने गंभीरता से लिया है, जल्द ही स्थानीय प्रशासन को मांग पत्र सौंपा जाएगा। अगर यहां की समस्याओं को दूर नहीं किया गया तो स्थानीय लोगों के साथ पार्टी एक बड़ा आंदोलन करने का काम करेगी।
गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हम सभी भारतवासियों को ये अधिकार प्रदान करता है। मनुष्य का जीवन सिर्फ जानवरों की तरह जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे सम्मान, बुनियादी सुविधाओंं और स्वतंत्रता के साथ एक सार्थक जीवन जीने का पूरा अधिकार है, लेकिन केन्द्र और राज्य की सरकारें भेदभाव बरत रही है, किसी क्षेत्र में जाति और धर्म के नाम पर तो कहीं किसी और कारणों से, जिसके कारन लोकतंत्र में समानता नहीं दिखती, जो संविधान का उल्लंघन है।
वीडियो रिपोर्टः