संवैधानिक मुल्य और संवैधानिक अधिकारों के रक्षा की मांग को लेकर हजारों ग्रामीण पहुंचे खूंटी, जिले के अधिकारी और सरकार को दी चेतावनी…

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रिपोर्ट- संजय वर्मा…

स्वामित्व कार्ड योजना के विरोध में दूसरी बार खूंटी में आयोजित किया गया विरोध सभा।

ग्रामसभा की बातों को अनसुना करना संविधान का उल्लंघन।

खूंटी के सांसद और दोनों विधायक हैं मुंडा, लेकिन जनता के साथ नही हैं खड़ें।

बजट सत्र के बाद सीएम आवास और खूंटी के सांसद और विधायकों का किया जाएगा आवास घेराव।

खूंटी जिला में 720 गांवों का होना है ड्रोन से सर्वे, 84 ग्रामसभा लिखित रुप से विरोध दर्ज करवा चुके हैं।

खूंटीः खूंटी जिले में स्वामित्व कार्ड योजना के तहत प्रोपर्टी कार्ड बनाने के लिए हो रहे ड्रोन से सर्वे का विरोध लगातार जारी है। झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में खूंटी जिला के 725 गांवों का ड्रोन से सर्वे कर, प्रोपर्टी कार्ड बनाने की बात कही गई है, इसलिए योजना को धरातल में उतारने के लिए अफरा-तफरी मची हुई है। खूंटी की जनता जानना चाहती है कि, आखिर क्यों खूंटी की जनता को अंधेरे में रखा गया? क्यों केन्द्र सरकार की स्वामित्व कार्य योजना को धरातल में उतारने से पहले टीएसी में नहीं लाया गया? क्यों कैबिनेट में पेश नही किया गया? क्यों दो-दो बार मेमोरेण्डम देने के बावजुद राज्यपाल महोदय इस मामले में मौन साधे हुए हैं? इसका जवाब खूंटी में रहने वाले पांचवी अनुसूची क्षेत्र की ग्रामसभा जानना चाहती हैं। उक्त बाते खूंटी के जदुरा जतरा तांड़ मैदान में आयोजित विरोध सभा में झारखंड की आयरन लेडी, दयामणि बारला ने कही।

खूंटी में 84 ग्रामसभा ड्रोन से सर्वे का विरोध प्रखंड/अंचल कार्यालय में दर्ज करवा चुके हैः

खूंटी के 84 ग्रामसभा ने अपने-अपने प्रखंड कार्यालय में ड्रोन सर्वे के खिलाफ आपत्ति दर्ज करवाया है। जिले के उपायुक्त और राज्य के पंचायती राज मंत्रालय में भी आपत्ति दर्ज करवाया गया है। इसके साथ ही विभिन्न राजनीतिक दलों को भी इस मामले से अवगत करवाया गया है, बावजुद इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। ऐसे में खूंटी की जनता बाध्य होकर अपने जल-जंगल और जमीन की रक्षा के लिए चरणबद्ध आंदोलन के राह पर चलते हुए संघर्ष का रास्ता इख्तियार कर चुके हैं।

स्वामित्व कार्ड योजना के विरोध सभा में उपस्थित पांचवी अनुसूचित क्षेत्र के हजारों ग्रामीण.

ड्रोन सर्वे के विरोध में दूसरी बार जदूरा जतरा मैदान में जुटें दर्जनों ग्राम प्रधान और हजारों जनताः

खूंटी जिला मुख्यालय से मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्थित जदुरा जतरा मैदान में एक बार फिर  दयामणि बारला ने खूंटी जिला के दूर-दराज के क्षेत्रों से पहुंचे ग्राम प्रधानों और लगभग 5000 से भी अधीक की संख्या में उपस्थित आदिवासी-मुलवासी जनता को संबोधित करते हुए कहा कि, खूंटी जिला भगवान बिरसा मुंडा की जन्म और कर्मस्थली दोनो है। भगवान बिरसा मुंडा ने लंबे संघर्ष के बाद ही आदिवासियों की रक्षा के लिए सीएनटी एक्ट लागू करवाने के लिए अंग्रेजों को बाध्य किया था, और हम लोग भी अब भगवान बिरसा मुंडा के नक्शे कदम पर चल पड़े हैं, क्योंकि झारखंड की गुंगी-बहरी सरकार और खूंटी के सांसद, विधायक लगातार पांचवी अनुसूची क्षेत्र में संवैधानिक मुल्य और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन कर रही है। इन लोगों को निंद से जगाना है और अपने हक् अधिकारों की रक्षा करनी है। जिले के अधिकारी अगर ग्रामसभा की बातों को अनसुना कर रहे हैं, तो ये निश्चित रुप से पांचवी अनुसूची के अधिकारों का हनन है।

अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए तपती धुप में जदुरा मैदान में उपस्थित ग्रामीण.

पूर्व में रघुवर सरकार सीएनटी एक्ट का उल्लंघन कर चुकी हैः

2014 में झारखंड की तात्कालीन रघुवर सरकार, पांचवी अनुसूची क्षेत्र समेत अन्य क्षेत्रों में भी सरना, मसना, हड़गड़ी, जीएम लैंड, और सामुदायिक जमीनों को बिना ग्रामसभा से राय लिए लैंड बैंक में शामिल कर चुकी है, जो सीएनटी एक्ट और पांचवी अनुसूची का उल्लंघन है। लैंड बैंक को रद्द करने की मांग को लेकर आधा दर्जन से अधीक बार जिले के उपायुक्त को आवेदन दिया गया, लेकिन आवेदनों पर अब तक कोई कार्रवाई नही हुई है। सरकार और सरकार के अधिकारी संवैधानिक मुल्य और संवैधानिक अधिकारों का लगातार उल्लंघन करते हुए अपने मन माफिक काम कर रही हैं। दयामणि बारला ने एक बार फिर कहा कि, हमारी लड़ाई हेमंत सोरेन की सरकार से नही है, हम सीएनटी एक्ट को कड़ाई से लागू करने की बात कह रहे हैं। हेमंत सरकार को राज्य की जनता ने पांचवी अनुसूची क्षेत्र की रक्षा करने, सीएनटी/एसपीटी एक्ट को कड़ाई से लागू करवाने और झारखंड के जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए झारखंड की सत्ता सौंपने का काम किया था। लेकिन ये सरकार भी पूर्व की रघुवर सरकार के कार्यों को आगे बढ़ाने का काम कर रही है। ऐसे में हेमंत सरकार को भी चेतावनी दी जाती है कि, पांचवी अनुसूची क्षेत्र के लोगों ने विधानसभा घेरने का काम किया है, अगर जल्द ही ड्रोन से सर्वे का काम नहीं रोका गया, तो बजट सत्र के बाद मुख्यमंत्री आवास भी घेरने का काम किया जाएगा।

खूंटी के सांसद और दोनों विधायक भी हैं मुंडा, फिर क्यों इस सवाल पर जनता के बीच नही जा रहे हैं?

खूंटी जिले के लगभग हर क्षेत्र में ड्रोन सर्वे का ग्रामीण विरोध कर रहे हैं। 84 ग्रामसभा द्वारा प्रखंड कार्यालय में आपत्ति दर्ज करवाया जा चुका है और विरोध के क्रम में कई पंचायतों में सर्वे करने पहुंची बीडीओ और सीओ को बंधक भी बनाया जा चुका है। पुरा खूंटी जिला प्रोपर्टी कार्ड के लिए हो रहे ड्रोन सर्वे के विरोध में खड़ा है, लेकिन अब तक खूंटी के सांसद, अर्जुन मुंडा, खूंटी के विधायक नीलकंठ सिंह मुंडा और तोरपा के विधायक कोचे मुंडा जनता के बीच जाना जरुरी नही समझे हैं। आखिर क्यों ये लोग भी जनता के सवालों से पीछे भाग रहे हैं? क्या जनता के सवालों का जवाब देने की हिम्मत यहां के सांसद और विधायकों में नही है? इनके रवैये से स्पष्ट होता है कि, ये लोग जनता को सिर्फ वोट बैंक मानते हैं। हकीकत में ये लोग भाजपा और कॉरपोरेट घरानों के सिर्फ दलाल बन कर रह चुके हैं, इन लोगों में अपने क्षेत्र की जनता के साथ खड़े रहने की हिम्मत नही है, ऐसे में इन्हें भी सबक सिखाया जाएगा। सीएम आवास घेराव के बाद खूंटी के सांसद, अर्जुन मुंडा और दोनों विधायकों का भी आवास खूंटी की जनता घेरेगी।

सभा की समाप्ति के बाद एक बार फिर से खूंटी जिले के उपायुक्त को ज्ञापन सौंप कर अविलंब ड्रोन से सर्वे पर रोक लगाने की मांग रखी गई।

संवैधानिक प्रावधानः-

पांचवी अनुसूची :-  पांचवी अनुसूची का मूल प्रारूप ‘अनुसूचित जनजाति’ की सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषायी एवं आर्थिक अस्तित्व की सुरक्षा का अति महत्वपूर्ण प्रावधान है। पांचवी अनुसूची की अवधारणा आदिवासी जनजीवन और उनकी जीवन शैली की गहराइयों एवं उनकी मूल भावना के साथ जुड़ी हुई है। भारत के 10 राज्यों के कई ज़िले पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आते हैं। भारत का संविधान इन क्षेत्रों में ‘सामान्य कानून व्यवस्था’ को लागू करने की इजाज़त नहीं देता है।

पेसा कानूनः- 1996 में पेसा कानून लागू किया गया। यह कानून सैद्धांतिक रुप से गांवों को स्वायत्तता देता है। पेसा कानून ग्रामसभा को सशक्त बनाता है और उसे लघु वन उत्पाद, लघु खनीज, सिंचाई, ग्रामसभा क्षेत्र में विकास करने पर स्वामित्व प्रदान करता है। इसके तहत ग्रामसभा की सिफारेशें मानने के लिए पंचायते बाध्य है। इतना ही नहीं सरकार के कोई भी अधिकारी ग्रामसभा के अनुमति के बगैर गांव में प्रवेश भी नहीं कर सकते हैं


जानकारी देते चलें कि 1996 में उच्चतम न्यायालय के एक आदेश के बाद पांचवी अनुसूची के प्रावधान प्रकाश में आए। न्यायालय का आदेश था कि अनुसूचित क्षेत्रों में सभी प्रकार के खनन और उद्योग गैरकानूनी हैं, क्योंकि खनन करने और उद्योग लगाने के लिए ग्रामसभा से इजाजत नहीं ली गई। उच्चतम न्यायालय ने ग्रामसभा की भूमिका को परिभाषित किया और खनन करने और उद्योग लगाने वाली कंपनियों को आदेश दिया कि, वे अपने राजस्व को को-ऑपरेटिव के माध्यम से स्थानीय लोगों के साथ साझा करे।

पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में इतने सारे संवैधानिक प्रावधान होने के बावजुद सरकार और सरकार के अधिकारी संविधान विरोधी कार्य कर रहे हैं, जिसका पांचवी अनुसूचित क्षेत्र के ग्रामीण लोकतांत्रिक तरीके से लगातार विरोध कर रहे हैं।  

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