गरीबी और विकलांगता भी नही हरा सकी हनुक के जज्बे को, नि:शुल्क करते हैं सर्पदंश समेत कई बीमारियों का ईलाज….

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रिपोर्ट- संजय वर्मा…

रांचीः इंसान में अगर कुछ कर गुजरने की छमता हो, तो कोई भी बाधा इंसान का रास्ता नही रोक सकता। ऐसे ही लोगों में से एक हैं हनुक लकड़ा, जो मात्र 2 वर्ष की उम्र में ही पोलियो के शिकार हो गए थें, लेकिन शारीरिक रुप से कमजोर होने के बावजुद भी हनुक ने हिम्मत नही हारी। हनुक काफी गरीब परिवार से हैं और तीन भाईयों में सबसे छोटे है। हनुक जब मां की गोद में ही था, उसी दौरान इनके सर से पिता का साया भी उठ गया। मां ने काफी कठिनाईयों का सामना करते हुए अपनी तीनों बेटों का पालन-पोषण किया। हनुक पढ़ाई में भी काफी तेज थें। चंदवा स्थित ख्रिस्त राजा हाई स्कूल के प्राचार्य ने हनुक के पारिवारिक स्थित और पढ़ाई के प्रति जज्बे को देखते हुए इन्हें होस्टल में ही रह कर पढ़ाई करने की अनुमति दी। इसके बाद हनुक ने लोहरदगा जिला स्थित बलदेव साहू हाई स्कूल से साईंस विषय में इंटरमीडियेट की परीक्षा पास की।

समाज सेवा के प्रति हनुक का जज्बाः 

इंटरमीडियेट तक की पढाई पुरी करने के बाद हनुक समाज सेवा से जुड़ गएं। विस्थापन के विरोध में चल रहे कई आंदोलनों में हनुक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। चुंकि हनुक साईंस के छात्र थें, इसलिए पेड़ पौधों के बारे में हनुक में विशेष जिज्ञाशा थी। हनुक के मामा जी जड़ी-बुटियों से ही सर्पदंश के मरीजों का ईलाज किया करते थें, जिनसे हनुक ने काफी कुछ सीखा। वन विभाग के अधिकारी पी.पी. हेम्ब्रोम हनुक के मामा जी के मित्र थें, जिन्हें औषधीय पौधों के बारे में विशेष जानकारी थी। रांची में “बिरसा संस्थान” से जुड़ने के दौरान ही हनुक को नोवामुंडी में पी.पी. हेम्ब्रोम से ट्रैनिंग लेने का मौका मिला।

डा. पी.पी. हेम्ब्रोम, होड़ोपैथी पद्धति से करते हैं मरीजों का ईलाजः

डा. पीपी हेम्ब्रोम के बारे में जानकारी देते चलें कि, डा. पी.पी. हेम्ब्रोम वन विभाग के सेवानिवृत अधिकारी है, जिन्हें होड़ोपैथी चिकित्सा पद्धती में महारत हांसिल है। इनके द्वारा गिरिडीह जिले में होड़ोपैथी केन्द्र भी संचालित है, जहां विभिन्न प्रकार के बीमारियों का ईलाज के साथ-साथ प्रशिक्षण भी दिया जाता है। हनुक लकड़ा ने वर्ष 2012 में पश्चिम सिंहभूम जिला के नोवामुंडी में संचालित “ओमोन महिला संगठन” के प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लिया, जहां डा. पी.पी. हेम्ब्रोम मुख्य प्रशिक्षक थें। यहां सफलता पूर्वक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद हनुक लकड़ा को प्रमाण पत्र भी दिया गया।

होड़ोपैथी चिकित्सा में ट्रेनिंग करने के बाद हनुक लकड़ा को मीला सर्टिफिकेट

हनुक सर्पदंश, किडनी, लकवा और पत्थरी का करते हैं ईलाजः

हनुक आगे बताते हैं कि समाज सेवा करना मेरा लक्ष्य रहा है।, इसलिए मैंने जड़ी बुटियों के बारे में अपने मामा जी और डा. पी.पी. हेम्ब्रम से जो सीखा, अब उसी को समाज सेवा का माध्यम बना चुका हूं। जड़ी-बुटियों से ही मैं सांप काटे मरीज, लकवा, किडनी की बीमारी और पत्थरी का ईलाज करता हूं। अब तक सैंकड़ों सांप काटे मरीज और 30 से भी अधीक लकवाग्रस्त मरीजों का सफलतापूर्वक ईलाज कर चुका हूं। हनुक ये भी बताते हैं कि, सेवा के बदले मैं किसी से पैसे नही लेता, मेरे ईलाज से ठीक होने के बाद लोग अपनी ईच्छा से जो भी दे देते हैं, वही मैं रख लेता हूं।

जड़ी-बुटियों से दवा तैयार करते हनुक लकड़ा.

हनुक लकड़ा के ईलाज पर लोगों को काफी विश्वास हैः मरीज के परिजन

समाचार संकलन के दौरान हमारी टीम ने सर्पदंश से ठीक हो चुके मरीजों से भी बात की। एक महिला जिन्हें लगभग 15 दिन पहले सांप ने डसा था, वो अब बिल्कुल स्वस्थ्य हो चुकी है। महिला ने बताया कि हनुक के ईलाज के बाद मैं पुरी तरह ठीक हूं और अब फिर से हर काम कर पा रही हूं। वहीं एक 5वर्षीय छोठी बच्ची, जिसे 5 दिन पूर्व सांप ने डसा था, वो बच्ची भी अब बिल्कुल ठीक है। बच्ची के पिता ने बताया कि अब मेरी बच्ची पुरी तरह स्वस्थ है। हनुक पर हम सभी को भरोषा है। हनुक ने जिस किसी भी मरीज का ईलाज अब तक किया है, उन मरीजों को एसोपैथी चिकित्सक के पास जाने की जरुरत नही पड़ी।

सांप पकड़ने में भी हनुक को है महारत हांसिलः

हनुक बताते हैं कि बालूमाथ प्रखंड में रसैल वाईपर, नाग और करैत सांप ज्यादा पाए जाते हैं। गर्मी के बाद जैसे ही बरसात शुरु होती है, क्षेत्र में सर्पदंश की घटना बढ़ जाती है। कई बार घरों में भी ये विशैले सांप प्रवेश कर जाते हैं, जिसके बाद लोग मुझे सांप पकड़ने के लिए भी बुलाते हैं। मैं इन सांपों को पकड़ कर फिर से जंगलों में छोड़ देता हूं।

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